हरिद्वार और चकराता वन प्रभाग में कार्यमुक्ति व कार्यभार हस्तांतरण पर सवाल, उच्चाधिकारियों की कार्यप्रणाली पर उठी उंगलियां - News Detail

हरिद्वार और चकराता वन प्रभाग में कार्यमुक्ति व कार्यभार हस्तांतरण पर सवाल, उच्चाधिकारियों की कार्यप्रणाली पर उठी उंगलियां

वन विभाग में तबादला आदेशों की अनदेखी! HoFF के निर्देशों के बावजूद डेढ़ साल से अटके तबादले

देहरादून। उत्तराखंड वन विभाग में तबादला आदेशों के अनुपालन को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। विभागाध्यक्ष एवं प्रमुख मुख्य वन संरक्षक (HoFF) के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद कुछ कर्मचारियों के स्थानांतरण आदेशों का समय पर पालन नहीं होने के आरोप सामने आए हैं। हरिद्वार और चकराता वन प्रभाग से जुड़े तीन प्रकरण विभागीय कार्यप्रणाली, प्रशासनिक जवाबदेही और स्थानांतरण नीति के अनुपालन पर सवाल खड़े करते हैं।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, HoFF ने निर्देश दिए थे कि 30 सितंबर 2026 तक सभी लंबित तबादला आदेशों का अनिवार्य रूप से अनुपालन कराया जाए और किसी को समयावधि में विस्तार न दिया जाए। इसके बावजूद कुछ मामलों में आदेशों के धरातल पर लागू नहीं होने की बात सामने आई है।
डेढ़ साल बाद भी हरिद्वार में जमे कर्मचारी
पहला मामला हरिद्वार वन प्रभाग के एक प्रधान सहायक और एक वरिष्ठ सहायक से जुड़ा है। जानकारी के मुताबिक, जून 2025 में पदोन्नति के बाद दोनों कर्मचारियों की तैनाती क्रमशः कार्यालय वन संरक्षक, यमुना वृत्त, देहरादून और गढ़वाल वन प्रभाग, पौड़ी में की गई थी। इसके बावजूद दोनों के अब तक हरिद्वार में ही कार्यरत रहने का दावा किया जा रहा है।
ऐसे में सवाल उठता है कि जब उच्च स्तर से स्थानांतरण के आदेश जारी किए गए थे, तो उनका अनुपालन सुनिश्चित क्यों नहीं हो पाया? क्या संबंधित अधिकारियों ने आदेशों के क्रियान्वयन की समीक्षा की?
चकराता वन प्रभाग में कार्यभार हस्तांतरण पर सवाल
दूसरा मामला चकराता वन प्रभाग का है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, जून 2026 में एक कनिष्ठ सहायक का स्थानांतरण कार्यालय वन संरक्षक, गढ़वाल वृत्त, पौड़ी किया गया था। आरोप है कि करीब तीन महीने तक आदेश का अनुपालन नहीं हुआ। निर्धारित समयसीमा नजदीक आने पर संबंधित कर्मचारी को कागजों में कार्यमुक्त तो कर दिया गया, लेकिन लगभग एक महीने बाद भी नए तैनाती स्थल पर कार्यभार हस्तांतरित नहीं किया गया।
यदि यह स्थिति सही है, तो यह प्रशासनिक आदेशों के प्रभावी क्रियान्वयन पर गंभीर प्रश्न खड़े करती है। साथ ही, यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि कार्यमुक्ति के बाद कार्यभार हस्तांतरण में देरी के लिए जिम्मेदारी किसकी है।
प्रस्तावित पदोन्नति से जुड़ा मामला भी चर्चा में
विभागीय सूत्रों के हवाले से यह भी दावा किया जा रहा है कि संबंधित कर्मचारी को निकट भविष्य में प्रस्तावित पदोन्नति के बाद दोबारा चकराता वन प्रभाग में तैनात किए जाने के प्रयास हो सकते हैं। हालांकि, इस संबंध में किसी आधिकारिक आदेश की पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे में विभाग को स्थिति स्पष्ट करते हुए पारदर्शिता सुनिश्चित करनी चाहिए, ताकि किसी भी प्रकार की पक्षपातपूर्ण कार्यप्रणाली की आशंकाओं पर विराम लग सके।
HoFF के निर्देशों के अनुपालन पर उठे सवाल
इन मामलों में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि जब स्थानांतरण संबंधी निर्देश उच्च स्तर से जारी हुए, तो उनके अनुपालन की जिम्मेदारी संभाल रहे अधिकारियों ने समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं की? क्या इन प्रकरणों की जानकारी विभागाध्यक्ष स्तर तक पहुंची है? यदि हां, तो अब तक क्या कदम उठाए गए हैं?
वन विभाग में स्थानांतरण और कार्यभार हस्तांतरण की प्रक्रिया नियमों के अनुरूप तथा पारदर्शी तरीके से संचालित होना आवश्यक है। आदेशों का समय पर पालन नहीं होने से न केवल प्रशासनिक व्यवस्था प्रभावित होती है, बल्कि उन कर्मचारियों के मनोबल पर भी असर पड़ता है जो निर्धारित नियमों के तहत अपनी जिम्मेदारियां निभाते हैं।
अब निगाहें प्रमुख मुख्य वन संरक्षक (HoFF) के अगले कदम पर टिकी हैं। क्या विभाग इन प्रकरणों की निष्पक्ष जांच कराकर जिम्मेदारी तय करेगा और अपने ही निर्देशों के अनुपालन में कथित लापरवाही पर कार्रवाई करेगा, या ये मामले भी विभागीय फाइलों तक सीमित रह जाएंगे? यह आने वाला समय बताएगा।
नोट: संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों का आधिकारिक पक्ष उपलब्ध होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाना चाहिए।

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